एक देश-एक चुनाव (one country-one election)

Posted on February 26th, 2019 | Create PDF File

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एक देश-एक चुनाव को लेकर देश में चर्चा चल रही है कुछ राजनीतिक दल इसके पक्ष में हैं तो कई इसके खिलाफ और कुछ अन्य दलों ने अभी इस पर अपनी राय ज़ाहिर नहीं की है। 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए। लेकिन उसके बाद राज्य सरकारें अपने 5 साल के कार्यकाल से पहले ही गिरने लगीं और गठबंधन टूटने लगे और फिर देश में विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव अलग-अलग कराए जाने लगे। अब पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी ने एक साथ चुनाव कराने को लेकर अपनी राय जताई है। तर्क है कि इससे देश का समय और पैसा बचेगा और साथ ही अलग-अलग चुनाव कराए जाने से विकास प्रक्रिया बाधित हो जाती है। क्योंकि आचार संहिता लागू होने से विकास कार्यों पर असर पड़ने लगता है। वहीं, चुनाव आयोग के अनुमानों के मुताबिक लोकसभा, विधानसभा चुनावों पर करीब 4,500 करोड़ रुपए खर्च किये जाते हैं।


देश में पहले भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए हैं। पहली चार लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव 1952, 1957, 1962 और 1967 में एक साथ हुए थे। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के अनुसार, 1967 के बाद स्थिति ऐसी आई कि चौथे आम चुनाव (1967) के बाद राज्यों में कान्ग्रेस के विकल्प के रूप में बनी संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकारें जल्दी-जल्दी गिरने लगीं और 1971 तक आते-आते राज्यों में मध्यावधि चुनाव होने लगे। 1969 में कान्ग्रेस का विभाजन हुआ और इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी, जबकि आम चुनाव कराए जाने के लिये एक वर्ष का समय शेष था। इस प्रकार पहली बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने का सिलसिला पूर्णत: भंग हो गया।

 

एक देश-एक चुनाव प्रणाली कितनी महत्त्वपूर्ण?

 

चुनाव आयोग ने कहा है कि लोकसभा व विधानसभा चुनाव 2019 में एक साथ कराना संभव नहीं है।इसके लिये कानूनी प्रक्रिया है जिसे सरकार को पूरा करना पड़ेगा।एक साथ चुनाव कराना चुनाव आयोग के लिये सुविधाजनक है। चुनावी खर्चों को बचाने के लिये तीन बार के बजाय एक बार चुनाव होना चाहिये। यदि वोटर, पोलिंग बूथ, मशीनरी चलाने वाला तंत्र और सिक्योरिटी एजेंसी के लिहाज से देखा जाए तो मतदाता के लिये यह सुविधाजनक होगा।लेकिन क्या चुनाव आयोग की सुविधा ही प्रजातंत्र में महत्त्वपूर्ण हो सकती है? इसके लिये अन्य कारकों पर भी गौर करना होगा। स्वस्थ प्रजातंत्र का होना ज़रूरी है और इस बात को ध्यान में रखकर ही मॉडल बनाए जाने चाहिये।भारत की संरचना संघीय है।पहले 4 चुनाव एक साथ कराए गए थे लेकिन इस पर भी विचार किया जाना चाहिये कि बाद में चुनाव एक साथ होने बंद क्यों हुए थे। वर्तमान समय में भी इस प्रकार के हालात उत्पन्न हो सकते हैं।यदि एक साथ सारे चुनाव करा दिये जाएँ तो इस बात की क्या गारंटी है कि सरकारें नहीं गिरेंगी।उदाहरण के लिये वाजपेयी जी की सरकार 13 दिन में ही गिर गई थी| ऐसी सूरत में 29 राज्यों में बहुमत के साथ आईं सरकारों का क्या होगा।कुछ सांसदों द्वारा सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की स्थिति में यदि लोकसभा में सरकार गिर गई तो सारे देश में उथल-पुथल की स्थिति उत्पन्न होगी जो देश हित में नहीं होगा।यही वज़ह है कि प्रधानमंत्री ने इस विषय पर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता पर बल दिया है। जब तक इस विषय पर आम सहमति नहीं होगी तब तक आगे कदम नहीं उठाया जा सकता।

 

यह ऐसा सवाल नहीं है जिसे पहली बार उठाया गया हो। इस सवाल को पहले भी उठाया जा चुका है। इस पर बहस भी हुई है, इस विषय पर विधि आयोग ने पहले भी अपने विचार व्यक्त किये हैं।वर्ष 2015 में संसदीय स्थायी समिति ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। समिति ने बीच का रास्ता निकालने का सुझाव देते हुए कहा था कि ऐसे विधानसभा जिनके चुनाव 6 महीने के अंदर होने वाले हैं, उनके लिये एक प्रावधान किया जा सकता है कि इनका चुनाव लोकसभा के चुनाव के साथ करा दिया जाए।लेकिन यह सुझाव व्यावहारिक नहीं लगता।
एक देश-एक चुनाव के पक्ष एवं विपक्ष में अपने-अपने तर्क है और जो तर्क हैं वह बहुत मज़बूत हैं।

 


विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट-

 

विधि आयोग ने वर्ष 1999 में दी गई अपनी 170वीं रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का समर्थन किया था। चुनाव सुधारों पर विधि आयोग की इस रिपोर्ट को देश में राजनीतिक प्रणाली के कामकाज पर अब तक के सबसे व्यापक दस्तावेज़ों में से एक माना जाता है। इस रिपोर्ट का एक पूरा अध्याय इसी पर केंद्रित है। राजनीतिक व चुनावी सुधारों से संबंधित इस रिपोर्ट में दलीय सुधारों पर भी काफी बल दिया गया है। राजनीतिक दलों के कोष, चंदा एकत्रित करने के तरीके और उसमें अनियमितताएँ तथा इन सबका राजनीतिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव आदि का भी इस रिपोर्ट में विश्लेषण किया गया है। आज ईवीएम में नोटा (NOTA) का जो विकल्प है, इसकी सिफारिश भी विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में ‘नकारात्मक मतदान की व्यवस्था लागू करने’ की बात कहकर की थी। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर यह विकल्प मतदाताओं को दिया गया।

 

इच्छा शक्ति तथा व्यवहार्यता-

 

इसमें दो चीजों पर जोर दिया जाना चाहिये पहला इच्छा शक्ति (desirebility) तथा दूसरा व्यवहार्यता या औचित्य (feasibility),यदि इच्छा शक्ति की बात करें तो यह विल्कुल ठीक है कि एक मतदाता एक ही मतदान केंद्र पर जाकर एक ही बार में तीन व्यक्तियों का चुनाव कर लेगा, यह उसके लिये सुविधाजनक भी होगा क्योंकि उसे बार-बार मतदान केंद्र पर नहीं जाना पड़ेगा।लेकिन हमें इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिये कि मतदाता जब मतदान के लिये जाता है और अपने मताधिकार का प्रयोग करता है तो वह एक ही समय में वोट डाल रहा होता है। इससे कहीं-न-कहीं लोकतांत्रिक सिद्धांतों (Democratic Principles) में थोड़ा सा हनन इसलिये होगा क्योंकि उसके मन में यह विचार अवश्य आएगा कि केंद्र में एक पार्टी के लिये वोट डालना है तो राज्य में भी उसी पार्टी को वोट करना है। शायद कहीं-न-कहीं उसका मंतव्य इस तरह का होगा।


हमारे देश में संविधान तथा संवैधानिक प्रावधान सर्वोपरि हैं।रूल ऑफ लॉ से कुछ भी बड़ा नहीं है।आज पूरे देश में यदि एक साथ चुनाव कराना है तो संविधान में संशोधन करना पड़ेगा और इसके लिये सभी दलों का सहयोग प्राप्त करना होगा| क्या आज की तारीख में यह संभव है?क्या ऐसा संवैधानिक प्रावधान संभव है कि विधानसभा को जल्द ही भंग कर दिया जाए।कई विधानसभाएँ इसके लिये तैयार नहीं होंगी।ऐसी स्थिति में क्या वर्तमान में कोई राजनीतिक दल विधानसभा भंग करने को तैयार होगा जिसको जनता ने पाँच साल के लिये चुना है।यदि विधानसभा को भंग करना है तो उसके लिये कानूनी प्रावधान का होना आवश्यक होगा| साथ ही, स्टेट ऑफ इमरजेंसी की घोषणा करनी पड़ेगी।


यह सही है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी राजस्व और समय की बचत होगी, पालिसी मेकिंग प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी।अमूमन देखा जाता है कि जब चुनाव का समय नज़दीक आता है तो सरकार में मंत्रीगण काफी व्यस्त हो जाते हैं जिससे नीतियाँ प्रभावित होती हैं, चुनाव आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य नहीं हो पाते।हमें इन चीजों पर भी ध्यान देना है साथ ही लोकतांत्रिक सिद्धांतों को भी देखना है।

 


क्या एक साथ चुनाव कराना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ समझौता नहीं होगा?

 

चुनावी खर्च बचाने की जो बात हो रही है क्या वह मूलभूत प्रजातांत्रिक सिद्धांतों से ऊपर है? यदि एक साथ चुनाव होते हैं तो इन सिद्धांतों से समझौता करना होगा यह एक बहुत बड़ा विषय है,इस पर अवश्य विचार होना चाहिये।चुनाव आयोग द्वारा इस पर पहले ही विचार-विमर्श किया जा चुका है।इस पर राजनीतिक दलों के विचार भी आ चुके हैं।इस विषय पर अन्य विशेषज्ञों के विचारों को लेकर विधि आयोग यदि एक समेकित रिपोर्ट देता है तो इसका संभावित हल तलाशा जा सकता है लेकिन इसके लिये संवैधानिक प्रावधान करने होंगे जो कि अभी तक नहीं किये गए हैं।

 


क्या भारत जैसे लोकतंत्र में एक देश-एक चुनाव व्यावहारिक हो सकता है?

 

एक देश एक चुनाव को लेकर लोग कई देशों से तुलना कर रहे हैं| भारतीय लोकतंत्र में क्या यह मुश्किल नहीं होगा? शुरू में जो चुनाव हुए हैं वे इसलिये एक साथ हो पाए क्योंकि चुनाव बाद कोई सरकार गिरी नहीं| बाद में यह क्रम टूट गया और यह समस्या पैदा हुई कि एक साथ चुनाव कैसे कराए जाएँ| इसकी जड़ में सरकार का संसदीय स्वरूप (parliamentary form of government) है।जहाँ तक विदेशों की बात है, खासकर अमेरिका के मामले में वहाँ के कानून में ही यह प्रावधान किया गया है कि हर चार साल बाद नवंबर के पहले मंगलवार को चुनाव होगा। इसकी वज़ह यह है कि वहाँ सरकारों के साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों का कोई रिश्ता नहीं है। वहाँ कार्यपालिका की सारी शक्ति राष्ट्रपति या गवर्नर में निहित है।वहाँ की कार्यपालिका सदन के प्रति जवाबदेह नहीं होती जबकि भारत में कार्यपालिका निम्न सदन के प्रति जवाबदेह होती है। यदि भारत के संविधान में संशोधन कर सरकार के संसदीय स्वरूप को बदलकर प्रेसीडेंसियल फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट किया जाता है तो इस समस्या का समाधान मुमकिन हो सकता है।असली समस्या सरकार का संसदीय स्वरूप है। हमें या तो इसे बदलना होगा या लोकसभा के कार्यकाल को तय करना होगा कि वह पाँच साल से पहले भंग नहीं होगी और यदि किसी वज़ह से सरकार गिर जाती है तो प्रमुख पहले, दूसरे तथा तीसरे दल को विकल्प के रूप में मौका देना होगा कि वह सरकार बनाने का दावा पेश करे। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो यह प्रावधान करना होगा कि सदन ही अपना नेता चुन ले और जिसे सबसे ज़्यादा मत प्राप्त हों उसे, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना दिया जाए।लेकिन इन मुद्दों पर बहस होनी चाहिये। यह तभी संभव है जब संविधान में संशोधन कर लोकसभा या विधानसभा का कार्यकाल तय किया जाए।

 


निष्कर्ष-

 

एक साथ चुनाव कराने का विचार प्रथम दृष्टया अच्छा प्रतीत होता है पर यह व्यावहारिक है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। बार-बार होने वाले चुनावों के कारण एक सुव्यवस्थित और स्थायित्व वाली सरकार की ज़रूरत महसूस होती है। लेकिन इसके लिये सबसे ज़रूरी है सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति का होना और यह कार्य बेहद मुश्किल प्रतीत होता है। संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद का कार्यकाल), अनुच्छेद 85 (संसदीय सत्र के स्थगन और समापन), अनुच्छेद 172 (विधानसभा का कार्यकाल) और अनुच्छेद 174 (विधानसभा सत्र को स्थगित करना और समापन करना) में संशोधन करना होगा। इसके बाद संविधान संशोधन के लिये दो-तिहाई बहुमत की भी ज़रूरत पड़ेगी, जिसे आम सहमति के बिना नहीं किया जा सकता। अतः अन्य व्यवहार्य विकल्पों पर गौर करने की ज़रूरत है।