पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी समसामयिकी 1 (2-May-2021)
नेट ज़ीरो उत्पादक मंच
(Net Zero Producers Forum)

Posted on May 2nd, 2021 | Create PDF File

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हाल ही में सऊदी अरब ‘नेट ज़ीरो उत्पादक मंच’ (Net Zero Producers’ Forum) में शामिल हुआ है।

 

नेट ज़ीरो उत्पादक मंच (Net Zero Producers’ Forum) :

संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, सऊदी अरब, कतर और नॉर्वे ने मिलकर ‘नेट ज़ीरो उत्पादक मंच’ (Net Zero Producers’ Forum) का निर्माण किया है।

 

‘नेट ज़ीरो उत्पादक मंच’, एक सहकारी मंच (कोआपरेटिव फोरम) है।

 

इस सहकारी मंच के अंतर्गत संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, सऊदी अरब, कतर और नॉर्वे मिलकर सम्मिलित रूप से नेट ज़ीरो उत्सर्जन हेतु व्यावहारिक रणनीतियों पर कार्य करेंगे।

 

गौरतलब है कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, सऊदी अरब, कतर और नॉर्वे सामूहिक रूप से 40% वैश्विक तेल और गैस उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं। इससे वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन का जोखिम बढ़ा हुआ है।

 

इसीलिए ये देश ‘नेट ज़ीरो उत्पादक मंच’ के अंतर्गत सामूहिक रूप से निम्नलिखित गतिविधियों को बढ़ावा देंगे, ताकि जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को कम किया जा सके-

मीथेन का न्यूनीकरण (methane abatement),

सर्कुलर कार्बन इकोनॉमी दृष्टिकोण को बढ़ावा,

स्वच्छ-ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा,

कार्बन कैप्चर और भंडारण हेतु प्रौद्योगिकियों का विकास,

हाइड्रोकार्बन राजस्व पर निर्भरता में कमी,

क्षेत्रीय परिस्थितियों के हिसाब से पर्यावरण फ्रेंडली प्रथाओं को अपनाने हेतु प्रोत्साहन,

वनों के क्षेत्र को बढ़ाना,

जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देना।

 

‘नेट-ज़ीरो’ या ‘कार्बन-तटस्थता’ :

‘नेट-ज़ीरो’ (Net-zero) को ‘कार्बन-तटस्थता’ (Carbon-neutrality) भी कहा जाता है।

 

कार्बन न्यूट्रैलिटी (कार्बन तटस्थता) या नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का तात्पर्य है कि जितनी कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित की जाएगी, उतनी ही कार्बन डाईऑक्साइड वातावरण से हटाई जाएगी।

 

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अर्थव्यवस्था के हर अहम सेक्टर को इको फ्रेंडली बनाना होता है।

 

विभिन्न देशों को अपनी अर्थव्यवस्था को प्रदूषण फैलाने वाले कोयले और गैस व तेल से चलने वाले बिजली स्टेशनों की जगह, पवन या सौर ऊर्जा फार्म जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों के ज़रिये सशक्त करना होता है।

 

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर कार्बन तटस्थता की स्थिति :

विकसित देशों द्वारा कार्बन तटस्थता की घोषणाओं के बाद भी कार्बन के उत्सर्जन में अपेक्षाकृत कमी नहीं ला पा रहे हैं ।

 

संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भूमि उपयोग और भूमि उपयोग परिवर्तन एवं वन संबंधित उत्सर्जन(land use and land use change and forest related emissions) पर गंभीरता से विचार विचार नहीं किया है।

 

यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जक बनने के लिए एक कानून बनाया गया है । यह कानून यूरोपीय संघ के सभी सदस्यों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी है। यह जलवायु कानून विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में ग्रीनहाउस उत्सर्जन को कम करने के लिए यूरोप की योजनाओं के लिए एक आधार तैयार करेगा।

 

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक़, कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन सबसे ऊपर है और इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है तथा तीसरे नंबर पर भारत मौजूद है।

 

भारत ने अप्रैल 2016 में औपचारिक रूप से पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किये थे। भारत का लक्ष्य 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक उत्सर्जन को 33-35 फीसद तक कम करना है।

 

इसके साथ ही भारत का लक्ष्य 2030 तक अतिरिक्त वनों के माध्यम से 2.5-3 अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड के बराबर कार्बन में कमी लाना है। भारत अपने लक्ष्यों की ओर तेजी से बढ़ रहा है।