राष्ट्रीय किसान दिवस और उसके मनाये जाने का कारण

Posted on December 23rd, 2018 | Create PDF File

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किसान दिवस प्रत्येक वर्ष 23 दिसम्बर को राष्ट्रीय किसान दिवस (kisan diwas)के रूप में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और किसानों के मसीहा माने जाने वाले चौधरी चरण सिंह की जयंती के दिन पूरे देश में बड़े ही उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन देश में अनेकों कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है व कृषि के ऊपर कई वाद-विवाद कार्यक्रम, समारोह, सेमिनार और प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है।

 

किसानों के मसीहा का योगदान

 

चौधरी चरण सिंह किसानों के सर्वमान्य नेता थे। चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसम्बर, 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में हुआ था। और वे भारत के पांचवें प्रधानमन्त्री बने थे। चरण सिंह के पिता चौधरी मीर सिंह ने अपने नैतिक मूल्यों को विरासत में चरण सिंह को सौंपा था। सम्पूर्ण जीवन भारतीयता और ग्रामीण परिवेश की मर्यादा में व्यतीत किया और उन्हें किसानों से खास लगाव था ।

 

  • किसान दिवस प्रत्येक वर्ष 23 दिसम्बर को मनाया जाता है ।
  • 2001 में सरकार ने हर साल 23 दिसंबर को किसान दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था ।
  • इस दिन किसानों के मसीहा माने जाने वाले चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था
  • 1952 में ”जमींदारी उन्मूलन विधेयक” को पारित करवाया ।
  • लेखपाल भर्ती में 18 प्रतिशत स्थान हरिजनों के लिए चौधरी चरण सिंह ने आरक्षित किया था।
  • किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया ।
  • राष्ट्रीय किसान दिवस पर अतीत के महान और उदार नेताओं को श्रद्धांजलि दी जाती है जो किसानों के कल्याण और विकास के प्रति समर्पित थे।

चौधरी चरण सिंह ने भूमि सुधारों पर काफ़ी काम किया था। चौधरी साहब ने किसानों, पिछड़ों और ग़रीबों की राजनीति की। वे जातिवाद को ग़ुलामी की जड़ मानते थे और कहते थे कि जाति प्रथा के रहते बराबरी, संपन्नता और राष्ट्र की सुरक्षा नहीं हो सकती है।

 

चौधरी चरण सिंह का राजनितिक योगदान

 

चौधरी चरण सिंह की मेहनत के कारण ही ‘‘जमींदारी उन्मूलन विधेयक” साल 1952 में पारित हो सका। इस एक विधेयक ने सदियों से खेतों में ख़ून पसीना बहाने वाले किसानों को जीने का मौका दिया। दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी चौधरी चरण सिंह ने प्रदेश के 27000 पटवारियों के त्यागपत्र को स्वीकार कर ‘लेखपाल‘ पद का सृजन कर नई भर्ती करके किसानों को पटवारी आतंक से मुक्ति तो दिलाई । लेखपाल भर्ती में 18 प्रतिशत स्थान हरिजनों के लिए चौधरी चरण सिंह ने आरक्षित किया था।

 

उत्तर प्रदेश के किसान चरण सिंह को अपना मसीहा मानने लगे थे। उन्होंने समस्त उत्तर प्रदेश में भ्रमण करते हुए कृषकों की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया। किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में खेती मुख्य व्यवसाय था। कृषकों में सम्मान होने के कारण इन्हें किसी भी चुनाव में हार का मुख नहीं देखना पड़ा।

 

3 अप्रैल 1967 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार सम्भाला और 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।इसके बाद वो दुबारा 17 फ़रवरी 1970 को मुख्यमंत्री बने। उन्होंने केन्द्र सरकार में गृहमंत्री पद पर कार्य करते हुए मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक [नाबार्ड] की स्थापना की।  28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस के सहयोग से देश के प्रधानमंत्री बने।

 

देश की प्रगति में किसानों का महत्त्व

 

हर देश की प्रगति में किसान विशेष रूप से सहायक होते हैं। उसी के बल पर देश अपने खाद्यान्नों की खुशहाली को समृद्ध कर सकता है। देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने किसानों को ही देश का सरताज माना था। परन्तु देश की आजादी के बाद ऐसे कम ही नेता हुए है जिन्होंने किसानों के विकास के लिए निष्पक्ष रूप से कार्य किया हो । ऐसे नेताओं में सबसे अग्रणी थे देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह।

 

पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह को किसानों के अभूतपूर्व विकास के लिए याद किया जाता है। उन्होंने हमेशा यह साबित करने की कोशिश की कि बगैर किसानों को खुशहाल किए देश व प्रदेश का विकास नहीं हो सकता। चौधरी चरण सिंह ने किसानों की खुशहाली के लिए खेती पर बल दिया था। किसानों को उपज का उचित दाम मिल सके इसके लिए भी वह गंभीर थे। उनका कहना था कि भारत का संपूर्ण विकास तभी होगा जब किसान, मज़दूर, ग़रीब सभी खुशहाल होंगे।