कला एवं संस्कृति समसामयिकी 1(2-August-2022)
'मिंजर मेला'
('Minjar Mela')

Posted on August 2nd, 2022 | Create PDF File

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प्रधानमंत्री ने 31 जुलाई, 2022 को ‘मन की बात’ की 91वीं कड़ी में 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' के तहत एकता की भावना को बढ़ावा देने में पारंपरिक मेलों के महत्त्व पर प्रकाश डाला।

 

इस दौरान प्रधानमंत्री ने चंबा के 'मिंजर मेला' का जिक्र किया।

 

हाल ही में इस मेले को केंद्र सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय दर्जा देने की भी घोषणा की गई है।

 

दरअसल, मक्के के पौधे के पुष्पक्रम को मिंजर कहते हैं।

 

जब मक्के पर फूल खिलते हैं, तो मिंजर मेला मनाया जाता है और इस मेले में देश भर से पर्यटक हिस्सा लेने आते हैं।

 

मिंजर मेला 935 ई. में त्रिगर्त (अब कांगड़ा के नाम से जाना जाने वाला) के शासक पर चंबा के राजा की विजय के उपलक्ष्य में, हिमाचल प्रदेश के चंबा घाटी में मनाया जाता है।

 

ऐसा कहा जाता है कि अपने विजयी राजा की वापसी पर लोगों ने उसका धान और मक्का की मालाओं से अभिवादन किया, जो कि समृद्धि और खुशी का प्रतीक है।

 

यह मेला श्रावण मास के दूसरे रविवार को आयोजित किया जाता है।

 

इस मेले की घोषणा के समय मिंजर का वितरण किया जाता है, जो पुरुषों और महिलाओं द्वारा समान रूप से पोशाक के कुछ हिस्सों पर पहना जाने वाला एक रेशम की लटकन है।

 

यह तसली धान और मक्का के अंकुर का प्रतीक है जो वर्ष के श्रावण मास के आसपास उगते हैं।

 

सप्ताह भर चलने वाला मेला तब शुरू होता है जब ऐतिहासिक चौगान में मिंजर ध्वज फहराया जाता है।