प्रकृति के कहर की भीषण बरसात : केरल बाढ़ (Kerala Flood)

Posted on August 29th, 2018 | Create PDF File

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पर्यावरणविदों के सुझवों की अनदेखी और चंद राजनैतिक स्वार्थों के चलते प्रकृति और उसके  पारिस्थितिकी तंत्र से छेड़छाड़ कितनी मंहगी पड़ सकती है, इसका जीता-जागता उदाहरण केरल की भीषण तबाही है। यूं तो मानव कितनी भी वैज्ञानिक प्रगति कर लेने का दंभ भरता रहा हो, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व सूचना और उनके प्रबंधन के संदर्भ में अबतक उसकी समझ अधूरी ही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर साल प्राकृतिक आपदाओं से करीब 1000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। जिसमें से 700 करोड़ अकेले अकेले बाढ़ से होने वाला नुकसान है। बाढ़ एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो देश के विभिन्न हिस्सों में हर साल भारी तबाही मचाती है। चाहे वह बीते वर्षों उत्तराखण्ड की बाढ़ त्रासदी रही हो अथवा तमिलनाडु के चेन्नई शहर की। बिहार, असम और  महाराष्ट्र  में तो हर साल बाढ़ का आना जैसे स्वाभाविक सा हो गया है। दरअसल देश की कुल वार्षिक वर्षा का 75 से 80 फीसदी हिस्सा मानसून के इन्हीं दो– ढ़ाई महीनों में बरस जाता है, जिससे देश की तमाम छोटी- बड़ी नदियों का जल स्तर अचानक अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। इसकी चपेट में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से हरसाल करीब 50 लाख लोग आते हैं।

 

भारत का दक्षिणी- पश्चिमी तटीय राज्य – केरल, इस समय सदी की सबसे भयंकर बाढ़ की मार झेल रहा है। गत 29 मई से 18 अगस्त तक यहां सामान्य से 175 % अधिक बारिश दर्ज की गई है। जिससे राज्य के सभी 14 जिलों की 41 नदियां ऊफान पर हैं। परिणामस्वरूप इडुक्की और इडमल्लार सहित सभी 80 बांधों का जल-स्तर तय सीमा से ऊपर उठने लगा और प्रशासन को उनके द्वार खोल देने पर मजबूर होना पड़ा। जिससे राज्य में जल-प्लावन की स्थिति बद से बदतर हो गई। अधिकांश पर्वतीय हिस्सों का संपर्क शेष राज्य से कट गया। जगह-जगह भूस्खलन की घटनाऐं सामने आईं। 40000 हेक्टेयर से ज्यादा फसलें बर्बाद हो गईं। पानी तटबंधों को तोड़ता हुआ लोगों के घरों में घुस गया। और 10 लाख से ज्यादा लोग देखते ही देखते गर से बेघर हो गए। उन्हें राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। केरल में 1924 के बाद से अबतक की ये सबसे ज्यादा ( 2226.0 mm ) बारिश हुई है, जो सामान्य ( 1620.0 mm) से करीब 41% अधिक है। वर्ष 1924 में यहां रिकार्ड 3369.0 mm बारिश हुई थी, जिसमें 1000 लोगों के मारे जाने के आंकड़े प्राप्त होते हैं।

 

इतनी भारी बारिश के बावजूद भी स्थिति नियंत्रण में रखी जा सकती थी यदि स्थानीयराज्य सरकार द्वारा वोटबैंक की राजनीति को परे रखकर पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों की सलाह की अनदेखी न की गई होती। देश के पश्चिमी घाट पर मानवीय गतिविधियों और बढ़ते हस्तक्षेप की समीक्षा करने के लिए केन्द्र सरकार नें गाडगिल कमेटी का गठन किया था। जिसने अपनी रिपोर्ट अगस्त 2011 में सौंपी थी। इस रिपोर्ट में केरल सहित सभी पश्चिमी-तटीय राज्यों के ‘इकोलाजिकल सेंसटिव जोन’ घोषित करते हुए उसमें किसी भी प्रकार के अवैध निर्माण को रोकने की सिफारिश की गई थी। लेकिन राज्य सरकारों द्वारा उस समय नागरिक हितों का हवाला देते हुए तथा चंद राजनैतिक स्वार्थों के चलते उस रिपोर्ट की अवहेलना की गई। उसके बाद कस्तूरीरंगन समिति ( अप्रैल, 2013) की सिफारिशों पर भी विशेष ध्यान नहीं दिया गया। फलतः अवैध खनन, वनों की कटाई और अवैध निर्माण बदस्तूर जारी रहा। ज्ञात हो कि केरल में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सबसे ज्यादा जान-माल का नुकसान इसी ‘ इकोलोजिकली सेंसटिव जोन’ (पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र) में हुआ है। साथ ही केन्द्रीय जल आयोग (CWC) और राज्य आपदा नियंत्रण बोर्ड नें न तो बांधों के द्वार खोले जाने और न ही बाढ़ के किसी भी पूर्वानुमान की चेतावनी जारी की। जिससे समय रहते तटीय इलाकों को खाली करवाकर काफी नुकसान टाला जा सकता था। मुख्यमंत्री पिनरई विजयन नें उच्च न्यायालय में बाढ़ के लिए तमिलनाडु राज्य को भी जिम्मेदार ठहराया है। उनके अनुसार मुल्लापेरियार बांध के द्वार अचानक खोले जाने के कारण स्थिति नियंत्रण के बाहर हो गई। हालांकि उनके इस बयान के सिर्फ राजनैतिक कयास भर लगाए जा रहे हैं।

 

फिलहाल केरल इस समय भीषण संकट से जूझ रहा है। राज्य की 1/6 जनसंख्या बाढ़ से प्रभावित बताई जा रही है। 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित होकर 4000 राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं। राज्य सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अबतक 400 से अधिक मौतों की पुष्टि हो चुकी है साथ ही दर्जनों लोग लापता बताए जा रहे हैं। राज्य के 80% से ज्यादा हिस्से में विद्युत आपूर्ति पूरी तरह ठप्प है। जिससे यातायात और संचार व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा है। दक्षिण भारतीय रेलवे की अधिकांश सुविधायें निलंबित कर दीं गई हैं। तथा राष्ट्रीय राजमार्गों सहित राज्य की 10000 किमी से ज्यादा सड़कें क्षतिग्रस्त हो गईं हैं। कई पुल तबाह हो गए हैं। राज्य का एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा, कोचीन 28 अगस्त तक के लिए बंद कर दिया गया है। ओणम और शबरीमाला की पवित्र यात्राओं जैसे पर्यटन आयोजनों को रद्द कर दिया गया है। संकट की इस घड़ी में केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा युध्द स्तर पर बचाव एवं राहत कार्य चलाए जा रहे हैं। 18 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी नें प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करके मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के साथ स्थिति की समीक्षा बैठक की और राज्य को 500 करोड़ की अंतरिम सहायता राशि प्रदान करने की घोषणा भी की। उन्होने कहा कि यह कोई अंतिम सहायता नहीं है, शीघ्र ही स्थिति की पुनर्समीक्षा करके केरल को आवश्यक सहायता राशि उपलब्ध करवाई जायेगी। साथ ही केन्द्र नें केरल की बाढ़ को “गंभीर प्राकृतिक आपदा”  घोषित कर दिया है। इससे पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी 100 करोड़ रुपये के राहत पैकेज का एलान कर चुके हैं। एक अनुमान के मुताबिक राज्य को करीब 21000 करोड़ का नुकसान हुआ है।

 

सुखद स्थिति यह रही कि इस मुश्किल घड़ी में केरल के लोगों के साथ सभी प्रकार के राजनैतिक, वैचारिक व सांस्कृतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देश के सभी राज्यों तथा सम्पूर्ण विश्व समुदाय नें मदद का हाथ बढ़ाया। भारतीय सेना, भारतीय जल सेना, भारतीय वायु सेना, NDRF और CAPF  सहित केन्द्र एवं राज्य सरकार के 14 सशस्त्र बलों, स्थानीय मछुआरों, RSS  समेत देश के करीब 52 स्वयंसेवी संगठनों, निकायों और संस्थाओं ने बचाव एवं राहत कार्यों मे बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। इन बचाव कार्यों में 67 हेलीकाप्टरों, 24 हवाई जहाजों, 548 मोटरबोटों सहित सैकड़ों स्थानीय नावों का प्रयोग किया गया। देश के विभिन्न हिस्सों से साढ़े चार लाख से ज्यादा लोगों ने केरल के मु.मं.राहत कोष में 713 करोड़ की राशि जमा करवाई, साथ ही विभिन्न प्रदेशों के मु. मंत्रियों द्वारा 211 करोड़ की आर्थिक मदद का एलान किया गया।

 

बारिश थमने और बाढ़ के पानी का स्तर गिरने के साथ ही राहत कार्य शुरु कर दिए गए हैं। लोग अपने घरों को लौटने लगे हैं। लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। जैसा कि बाढ़ के बाद अक्सर देखने में आता है- गंदगी और दूषित जल जमाव के कारण अनेक प्रकार के काटाणु और वैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं। जिनसे जनित संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका रहती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए स्थानीय लोगों और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा समूह बनाकर सामूहिक सफाई अभियान चलाए जा रहे हैं। केन्द्र सरकार ने राज्य द्वारा मांगी गई सभी 90 प्रकार की दवाओं की पर्याप्त आपूर्ति कर दी है। मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने कहा है कि एकबार पुनर्वास स्थापित होते ही हर गांव में चिकित्सा टीम भेजी जाएगी। ताकि किसी भी प्रकार की संक्रामक बिमारियों के फैलने की समस्त संभावनाओं पर पूर्णतया अंकुश लगाया जा सके। केन्द्र नें इस विभीषिका में अपनी जान गवाने वाले व्यक्तियों के परिजनों को 2- 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता तथा गंभीर रूप घायलों को 50-50000 रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही बीमा कंपनियों को यह निर्देश दिया गया है कि वे कैंप लगाकर पैसों का निपटान जल्द से जल्द पूरा कर लें। जिन लोगों के घर ध्वस्त हो गये हैं, उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर मुहैया कराया जायेगा। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी नें राष्ट्रीय राजमार्गों के शीघ्रातिशीघ्र सरम्मत व निर्माण कार्य शुरु कर देने के निर्देश जारी किए हैं।

 

केरल बाढ़ पीढ़ितों की मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्य-एशिया, यूरोप और अरब देशों से भी सहयता प्रस्ताव पेश किए गये थे, जिन्हें विदेशमंत्री सुषमास्वराज ने अपनी विदेशनीति का हवाला देते हुए यहकहकर लेने से इंकार कर दिया कि हम अपनी आंतरिक आपदा से निपटने के लिए स्वयं सक्षम हैं। ज्ञात हो कि वर्ष 2004 में आई सुनामी के बाद  तत्कालीन UPA  सरकार ने राष्ट्रीय आपदा नीति में इस प्रकार के संशोधन किए थे।

 

ईश्वर की भूमि- केरल, की बाढ़ राहत में क्रिक्रेटरों, फिल्मस्टारों, राजनेताओं तथा आम नागरिकों द्वारा जिस तरह से एकजुट होकर मदद पहुंचाई जा रही है यह हमारे देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विरासत का एक जीता- जागता उदाहरण है। भविष्य में भी हमें इसी तरह एक स्वस्थ लोकतंत्र और विभिन्नता में एकता की भावना को पुष्ट करते हुए विपत्ति के समय एक-दूसरे के हाथ को थामे रखना होगा ताकि हमारी अखण्डता और प्रभुसत्ता अक्षुण्य बनी रहे। साथ ही पर्यावरण और जैव संसाधनों के बीच उचित संतुलन और सामजस्य स्थापित करने का प्रयास जारी रखना होगा ताकि जनजागरुकता और संसूचना प्रसारण केन्द्रों की सक्रियता के माध्यम से इस प्रकार की आपदाओं को दोहराने से रोका जा सके।