राष्ट्रीय समसामयिकी 2 (13-September-2021)
स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो संबोधन की 128वीं वर्षगांठ
(128th Anniversary of Swami Vivekananda's Historic Chicago Address)

Posted on September 13th, 2021 | Create PDF File

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11 सितंबर, 1893 को, स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ (Parliament of the World’s Religions) में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था, जिसमे उनके लिए महासभा में सम्मलित व्यक्ति पूरे दो मिनट तक खड़े होकर तालियाँ बजाते रहे।

 

इस एतिहासिक भाषण के पश्चात उन्हें ‘भारत का चक्रवाती भिक्षु’ (Cyclonic Monk of India) का उपनाम दिया गया।

 

इस वर्ष स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो संबोधन की 128वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।

 

इस आयोजन का महत्व :

 

शिकागो में दिए गए भाषण में हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का विस्तार से वर्णन गया था, और इस भाषण के शब्द आज भी गुंजायमान हैं।

 

विश्व धर्म संसद में अपने प्रसिद्ध भाषण के बाद स्वामी विवेकानंद पश्चिमी दुनिया में काफी लोकप्रिय हो गए।

 

उन्हें भारत में हिंदू धर्म के पुनरुद्धार और 19वीं शताब्दी के अंत में एक प्रमुख विश्व धर्म का दर्जा दिलाने के लिए एक प्रमुख शक्ति माना जाता है।

 

1893 में शिकागो में विश्व “धर्म संसद” में उनके भाषण ने दुनिया का ध्यान वेदांत के प्राचीन भारतीय दर्शन की ओर भी आकर्षित किया।

 

स्वामी विवेकानंद के बारे में :

 

वह वास्तविक रूप से एक तेजस्वी व्यक्‍ति थे, और इनके लिए पश्चिमी जगत को हिंदू धर्म से परिचित कराने का श्रेय दिया जाता है।

 

वह श्री रामकृष्ण परमहंस के एक उत्साही शिष्य और भारत में हिंदू धर्म का पुनरुद्धार करने में एक प्रमुख शक्ति थे।

 

उन्होंने औपनिवेशिक भारत में राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया, और उन्होंने वर्ष 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में अपना सर्वाधिक प्रसिद्ध भाषण दिया था ।

 

वर्ष 1984 में भारत सरकार द्वारा स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस 12 जनवरी को ‘राष्ट्रीय युवा दिवसके रूप में घोषित किया गया था।

 

प्रारंभिक जीवन एवं योगदान :

 

12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्मे स्वामी विवेकानंद को उनके संन्यास-पूर्व जीवन में नरेंद्र नाथ दत्त के नाम से जाना जाता था।

 

उन्हें योग और वेदांत संबंधी हिंदू दर्शन को पश्चिम में प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है।

 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विवेकानंद को “आधुनिक भारत का निर्माता कहा था।

 

1893 में, खेतड़ी राज्य के महाराजा अजीत सिंह के अनुरोध पर उन्होंने ‘विवेकानंद’ नाम धारण किया था।

 

उन्होंने, सबसे निर्धन और निकृष्ट लोगों तक उत्कृष्ट विचारों को पहुचाने के लिए, 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

 

वर्ष 1899 में उन्होंने बेलूर मठ की स्थापना की, जो आगे चलकर उनका स्थायी निवास बन गया।

 

उन्होंने ‘नव-वेदांत’, पश्चिमी दृष्टिकोण से हिंदू धर्म की व्याख्या, का प्रचार किया, और वह भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिकता के संयोजन में विश्वास करते थे।

 

उनके द्वारा रचित पुस्तकें :

 

‘राज योग’, ‘ज्ञान योग’, ‘कर्म योग’ उनके द्वारा लिखी गयी कुछ पुस्तकें हैं।

 

स्वामी विवेकानंद के विचारों की वर्तमान में प्रासंगिकता :

 

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में ‘सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकरण’ के विचार का प्रसार किया था।

 

उन्होंने, समाज में राष्ट्रों और सभ्यताओं के लिए अर्थहीन और सांप्रदायिक संघर्षों से उत्पन्न खतरों का विश्लेषण किया था।

 

उनका दृढ़ विश्वास था, कि धर्म का वास्तविक सार ‘सामूहिक भलाई और सहिष्णुता’ होता है। धर्म का स्थान, अंधविश्वास और कट्टरता से ऊपर होना चाहिए।

 

स्वामी विवेकानंद का मानना था, कि भारत की युवा पीढी हमारे अतीत को एक महान भविष्य से जोड़ती है।

 

इसलिए, आज समकालीन भारत में, स्वामी विवेकानंद द्वारा 1893 में कहे गए शब्दों पर ध्यान देने की अधिक आवश्यकता है।